श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.39

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

यत्र भागवता राजन् साधवो विशदाशयाः।

भगवद‍्गुणानुकथनश्रवणव्यग्रचेतसः ॥ ३९

yatra bhāgavatā rājan sādhavo viśadāśayāḥ|

bhagavadguṇānukathanaśravaṇavyagracetasaḥ || 39

अर्थ

राजन्! जहाँ भगवद‍्गुणोंको कहने और सुननेमें तत्पर विशुद्धचित्त भक्तजन रहते हैं, उस साधु-समाजमें सब ओर महापुरुषोंके मुखसे निकले हुए श्रीमधुसूदनभगवान्‌के चरित्ररूप शुद्ध अमृतकी अनेकों नदियाँ बहती रहती हैं। जो लोग अतृप्त-चित्तसे श्रवणमें तत्पर अपने कर्णकुहरोंद्वारा उस अमृतका छककर पान करते हैं, उन्हें भूख-प्यास, भय, शोक और मोह आदि कुछ भी बाधा नहीं पहुँचा सकते॥ ३९-४०॥✎ 419

यह अर्थ श्लोक 39–40 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #419 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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