भगवान् वासुदेवमें एकाग्रतापूर्वक सम्यक् प्रकारसे किया हुआ भक्तिभाव ज्ञान और वैराग्यका आविर्भाव कर देता है॥ ३७॥✎ 419
वासुदेवे भगवति भक्तियोगः समाहितः।
सध्रीचीनेन वैराग्यं ज्ञानं च जनयिष्यति॥ ३७
भगवान् वासुदेवमें एकाग्रतापूर्वक सम्यक् प्रकारसे किया हुआ भक्तिभाव ज्ञान और वैराग्यका आविर्भाव कर देता है॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 557) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)