॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.29.35
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते।
मनसा लिंगरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा॥ ३५
arthe hyavidyamāne'pi saṃsṛtirna nivartate|
manasā liṃgarūpeṇa svapne vicarato yathā|| 35
अर्थ
जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें अपने मनोमय लिंगशरीरसे विचरनेवाले प्राणीको स्वप्नके पदार्थ न होनेपर भी भासते हैं, उसी प्रकार ये दृश्यपदार्थ वस्तुतः न होनेपर भी, जबतक अज्ञान-निद्रा नहीं टूटती, बने ही रहते हैं और जीवको जन्म-मरणरूप संसारसे मुक्ति नहीं मिलती। (अतः इनकी आत्यन्तिक निवृत्तिका उपाय एकमात्र आत्मज्ञान ही है)॥ ३५॥✎ 1607