श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.33

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

यथा हि पुरुषो भारं शिरसा गुरुमुद्वहन्।

तं स्कन्धेन स आधत्ते तथा सर्वाः प्रतिक्रियाः॥ ३३

yathā hi puruṣo bhāraṃ śirasā gurumudvahan|

taṃ skandhena sa ādhatte tathā sarvāḥ pratikriyāḥ|| 33

अर्थ

वह ऐसी ही है जैसे कोई सिरपर भारी बोझा ढोकर ले जानेवाला पुरुष उसे कंधेपर रख ले। इसी तरह सभी प्रतिक्रिया (दुःखनिवृत्ति) जाननी चाहिये—यदि किसी उपायसे मनुष्य एक प्रकारके दुःखसे छुट्टी पाता है, तो दूसरा दुःख आकर उसके सिरपर सवार हो जाता है॥ ३३॥✎ 1607

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1607 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आत्म-ज्ञान → आत्मज्ञान

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