श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

आत्मानं कन्यया ग्रस्तं पंचालानरिदूषितान्।

दुरन्तचिन्तामापन्‍नो न लेभे तत्प्रतिक्रियाम्॥ ८

ātmānaṃ kanyayā grastaṃ paṃcālānaridūṣitān|

durantacintāmāpanno na lebhe tatpratikriyām|| 8

अर्थ

उसने देखा कि सारा नगर नष्ट-भ्रष्ट हो गया है; पुत्र, पौत्र, भृत्य और अमात्यवर्ग प्रतिकूल होकर अनादर करने लगे हैं; स्त्री स्नेहशून्य हो गयी है, मेरी देहको कालकन्याने वशमें कर रखा है और पांचालदेश शत्रुओंके हाथमें पड़कर भ्रष्ट हो गया है। यह सब देखकर राजा पुरंजन अपार चिन्तामें डूब गया और उसे उस विपत्तिसे छुटकारा पानेका कोई उपाय न दिखायी दिया॥ ७-८॥

यह अर्थ श्लोक 7–8 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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