श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.6

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

कन्योपगूढो नष्टश्रीः कृपणो विषयात्मकः।

नष्टप्रज्ञो हृतैश्‍वर्यो गन्धर्वयवनैर्बलात्॥ ६

kanyopagūḍho naṣṭaśrīḥ kṛpaṇo viṣayātmakaḥ|

naṣṭaprajño hṛtaiśvaryo gandharvayavanairbalāt|| 6

अर्थ

कालकन्याके आलिंगन करनेसे उसकी सारी श्री नष्ट हो गयी तथा अत्यन्त विषयासक्त होनेके कारण वह बहुत दीन हो गया, उसकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी। गन्धर्व और यवनोंने बलात् उसका सारा ऐश्‍वर्य लूट लिया॥ ६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें