श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.59

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

तस्मिंस्त्वं रामया स्पृष्टो रममाणोऽश्रुतस्मृतिः।

तत्संगादीदृशीं प्राप्तो दशां पापीयसीं प्रभो॥ ५९

tasmiṃstvaṃ rāmayā spṛṣṭo ramamāṇo'śrutasmṛtiḥ|

tatsaṃgādīdṛśīṃ prāpto daśāṃ pāpīyasīṃ prabho|| 59

अर्थ

भाई! उस नगरमें उसकी स्वामिनीके फंदेमें पड़कर उसके साथ विहार करते-करते तुम भी अपने स्वरूपको भूल गये और उसीके संगसे तुम्हारी यह दुर्दशा हुई है ॥ ५९॥

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