वह चीर-वस्त्र धारण किये रहती, व्रत उपवासादिके कारण उसका शरीर अत्यन्त कृश हो गया था और सिरके बाल आपसमें उलझ जानेके कारण उनमें लटें पड़ गयी थीं। उस समय अपने पतिदेवके पास वह अंगारभावको प्राप्त धूमरहित अग्निके समीप अग्निकी शान्त शिखाके समान सुशोभित हो रही थी॥ ४४॥
चीरवासा व्रतक्षामा वेणीभूतशिरोरुहा।
बभावुप पतिं शान्ता शिखा शान्तमिवानलम्॥ ४४
वह चीर-वस्त्र धारण किये रहती, व्रत उपवासादिके कारण उसका शरीर अत्यन्त कृश हो गया था और सिरके बाल आपसमें उलझ जानेके कारण उनमें लटें पड़ गयी थीं। उस समय अपने पतिदेवके पास वह अंगारभावको प्राप्त धूमरहित अग्निके समीप अग्निकी शान्त शिखाके समान सुशोभित हो रही थी॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 550) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/44/