इस प्रकार महाबली यवनराजके बलपूर्वक खींचनेपर भी राजा पुरंजनने अज्ञानवश अपने हितैषी एवं पुराने मित्र अविज्ञातका स्मरण नहीं किया॥ २५॥
विकृष्यमाणः प्रसभं यवनेन बलीयसा।
नाविन्दत्तमसाऽऽविष्टः सखायं सुहृदं पुरः॥ २५
इस प्रकार महाबली यवनराजके बलपूर्वक खींचनेपर भी राजा पुरंजनने अज्ञानवश अपने हितैषी एवं पुराने मित्र अविज्ञातका स्मरण नहीं किया॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 548) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/25/