श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.11

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

भयनाम्नोऽग्रजो भ्राता प्रज्वारः प्रत्युपस्थितः।

ददाह तां पुरीं कृत्स्नां भ्रातुः प्रियचिकीर्षया॥ ११

bhayanāmno'grajo bhrātā prajvāraḥ pratyupasthitaḥ|

dadāha tāṃ purīṃ kṛtsnāṃ bhrātuḥ priyacikīrṣayā|| 11

अर्थ

इतनेमें ही यवनराज भयके बड़े भाई प्रज्वारने अपने भाईका प्रिय करनेके लिये उस सारी पुरीमें आग लगा दी॥ ११॥

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