श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.27.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

तयोपगूढः परिरब्धकन्धरो

रहोऽनुमन्त्रैरपकृष्टचेतनः ।

न कालरंहो बुबुधे दुरत्ययं

दिवा निशेति प्रमदापरिग्रहः॥ ३

tayopagūḍhaḥ parirabdhakandharo

raho'numantrairapakṛṣṭacetanaḥ |

na kālaraṃho bubudhe duratyayaṃ

divā niśeti pramadāparigrahaḥ|| 3

अर्थ

पुरंजनीने राजाका आलिंगन किया और राजाने उसे गले लगाया। फिर एकान्तमें मनके अनुकूल रहस्यकी बातें करते हुए वह ऐसा मोहित हो गया कि उस कामिनीमें ही चित्त लगा रहनेके कारण उसे दिन-रातके भेदसे निरन्तर बीतते हुए कालकी दुस्तर गतिका भी कुछ पता न चला॥ ३॥

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