श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.27.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

ते चण्डवेगानुचराः पुरंजनपुरं२ यदा।

हर्तुमारेभिरे तत्र प्रत्यषेधत्प्रजागरः॥ १५

te caṇḍavegānucarāḥ puraṃjanapuraṃ yadā|

hartumārebhire tatra pratyaṣedhatprajāgaraḥ|| 15

अर्थ

गन्धर्वराज चण्डवेगके उन अनुचरोंने जब राजा पुरंजनका नगर लूटना आरम्भ किया, तब उन्हें पाँच फनके सर्प प्रजागरने रोका॥ १५॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—पुरीं।

    (मुद्रित पृष्ठ 544)

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