श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.26.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

आसुरीं वृत्तिमाश्रित्य घोरात्मा निरनुग्रहः।

न्यहनन्‍निशितैर्बाणैर्वनेषु वनगोचरान्॥ ५

āsurīṃ vṛttimāśritya ghorātmā niranugrahaḥ|

nyahananniśitairbāṇairvaneṣu vanagocarān|| 5

अर्थ

इस समय आसुरीवृत्ति बढ़ जानेसे उसका चित्त बड़ा कठोर और दयाशून्य हो गया था, इससे उसने अपने तीखे बाणोंसे बहुत-से निर्दोष जंगली जानवरोंका वध कर डाला॥ ५॥✎ 418

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #418 शब्दोंके बीचका स्थान: (बंब),दो → (बंब), दो

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