श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.26.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

नारद उवाच

पुरंजनः स्वमहिषीं निरीक्ष्यावधुतां भुवि।

तत्संगोन्मथितज्ञानो वैक्लव्यं परमं ययौ॥ १८

puraṃjanaḥ svamahiṣīṃ nirīkṣyāvadhutāṃ bhuvi|

tatsaṃgonmathitajñāno vaiklavyaṃ paramaṃ yayau|| 18

अर्थ

श्रीनारदजी कहते हैं—राजन्! उस स्त्रीके संगसे राजा पुरंजनका विवेक नष्ट हो चुका था; इसलिये अपनी रानीको पृथ्वीपर अस्त-व्यस्त अवस्थामें पड़ी देखकर वह अत्यन्त व्याकुल हो गया॥ १८॥

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