कभी वह सुनने लगती तो आप भी सुनने लगता, देखती तो देखने लगता, सूँघती तो सूँघने लगता और किसी चीजको छूती तो आप भी छूने लगता॥ ६०॥
क्वचिच्छृणोति शृण्वन्त्यां पश्यन्त्यामनु पश्यति।
क्वचिज्जिघ्रति जिघ्रन्त्यां स्पृशन्त्यां स्पृशति क्वचित्॥ ६०
कभी वह सुनने लगती तो आप भी सुनने लगता, देखती तो देखने लगता, सूँघती तो सूँघने लगता और किसी चीजको छूती तो आप भी छूने लगता॥ ६०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.60 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 539) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/25/60/