श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.58

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

क्‍वचिद्गायति गायन्त्यां रुदत्यां रुदति क्‍वचित्।

क्‍वचिद्धसन्त्यां हसति जल्पन्त्यामनु जल्पति॥ ५८

kvacidgāyati gāyantyāṃ rudatyāṃ rudati kvacit|

kvaciddhasantyāṃ hasati jalpantyāmanu jalpati|| 58

अर्थ

इसी प्रकार कभी उसके गानेपर गाने लगता, रोनेपर रोने लगता, हँसनेपर हँसने लगता और बोलनेपर बोलने लगता॥ ५८॥

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