श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.30

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

यदेष मापांगविखण्डितेन्द्रियं

सव्रीडभावस्मितविभ्रमद्भ्रुवा ।

त्वयोपसृष्टो भगवान्मनोभवः

प्रबाधतेऽ५थानुगृहाण शोभने॥ ३०

yadeṣa māpāṃgavikhaṇḍitendriyaṃ

savrīḍabhāvasmitavibhramadbhruvā |

tvayopasṛṣṭo bhagavānmanobhavaḥ

prabādhate'thānugṛhāṇa śobhane|| 30

अर्थ

परंतु आज तुम्हारे कटाक्षोंने मेरे मनको बेकाबू कर दिया है। तुम्हारी लजीली और रतिभावसे भरी मुसकानके साथ भौंहोंके संकेत पाकर यह शक्तिशाली कामदेव मुझे पीड़ित कर रहा है। इसलिये सुन्दरि! अब तुम्हें मुझपर कृपा करनी चाहिये॥ ३०॥

टिप्पणियाँ

  1. ५

    प्रा० पा०—ते मानुगृहाण।

    (मुद्रित पृष्ठ 536)

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