॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.25.19
नानारण्यमृगव्रातैरनाबाधे मुनिव्रतैः।
आहूतं मन्यते पान्थो यत्र कोकिलकूजितैः॥ १९
nānāraṇyamṛgavrātairanābādhe munivrataiḥ|
āhūtaṃ manyate pāntho yatra kokilakūjitaiḥ|| 19
अर्थ
वहाँके वन्य पशु भी मुनिजनोचित अहिंसादि व्रतोंका पालन करनेवाले थे, इसलिये उनसे किसीको कोई कष्ट नहीं पहुँचता था। वहाँ बार-बार जो कोकिलकी कुहू-ध्वनि होती थी, उससे मार्गमें चलनेवाले बटोहियोंको ऐसा भ्रम होता था मानो वह बगीचा विश्राम करनेके लिये उन्हें बुला रहा है॥ १९॥