उस नगरके बाहर दिव्य वृक्ष और लताओंसे पूर्ण एक सुन्दर बाग था; उसके बीचमें एक सरोवर सुशोभित था। उसके आस-पास अनेकों पक्षी भाँति-भाँतिकी बोली बोल रहे थे तथा भौंरे गुंजार कर रहे थे॥ १७॥
पुर्यास्तु बाह्योपवने दिव्यद्रुमलताकुले।
नदद्विहंगालिकुलकोलाहलजलाशये ॥ १७
उस नगरके बाहर दिव्य वृक्ष और लताओंसे पूर्ण एक सुन्दर बाग था; उसके बीचमें एक सरोवर सुशोभित था। उसके आस-पास अनेकों पक्षी भाँति-भाँतिकी बोली बोल रहे थे तथा भौंरे गुंजार कर रहे थे॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 535) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/17/