श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.56

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

यत्र निर्विष्टमरणं कृतान्तो नाभिमन्यते।

विश्‍वं विध्वंसयन् वीर्यशौर्यविस्फूर्जितभ्रुवा॥ ५६

yatra nirviṣṭamaraṇaṃ kṛtānto nābhimanyate|

viśvaṃ vidhvaṃsayan vīryaśauryavisphūrjitabhruvā|| 56

अर्थ

जो काल अपने अदम्य उत्साह और पराक्रमसे फड़कती हुए भौंहके इशारेसे सारे संसारका संहार कर डालता है, वह भी आपके चरणोंकी शरणमें गये हुए प्राणीपर अपना अधिकार नहीं मानता॥ ५६॥✎ 414

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #414 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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