जो काल अपने अदम्य उत्साह और पराक्रमसे फड़कती हुए भौंहके इशारेसे सारे संसारका संहार कर डालता है, वह भी आपके चरणोंकी शरणमें गये हुए प्राणीपर अपना अधिकार नहीं मानता॥ ५६॥✎ 414
यत्र निर्विष्टमरणं कृतान्तो नाभिमन्यते।
विश्वं विध्वंसयन् वीर्यशौर्यविस्फूर्जितभ्रुवा॥ ५६
जो काल अपने अदम्य उत्साह और पराक्रमसे फड़कती हुए भौंहके इशारेसे सारे संसारका संहार कर डालता है, वह भी आपके चरणोंकी शरणमें गये हुए प्राणीपर अपना अधिकार नहीं मानता॥ ५६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.56 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 530) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/24/56/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)