श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.53

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

एतद्रूपमनुध्येयमात्मशुद्धिमभीप्सताम् ।

यद्भक्तियोगोऽभयदः स्वधर्ममनुतिष्ठताम्॥ ५३

etadrūpamanudhyeyamātmaśuddhimabhīpsatām |

yadbhaktiyogo'bhayadaḥ svadharmamanutiṣṭhatām|| 53

अर्थ

प्रभो! चित्तशुद्धिकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषको आपके इस रूपका निरन्तर ध्यान करना चाहिये; इसकी भक्ति ही स्वधर्मका पालन करनेवाले पुरुषको अभय करनेवाली है॥ ५३॥✎ 414

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #414 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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