अन्तर्धानके नभस्वती नामकी पत्नीसे एक और पुत्र-रत्न हविर्धान प्राप्त हुआ। महाराज अन्तर्धान बड़े उदार पुरुष थे। जिस समय इन्द्र उनके पिताके अश्वमेध-यज्ञका घोड़ा हरकर ले गये थे, उन्होंने पता लग जानेपर भी उनका वध नहीं किया था॥ ५॥
अन्तर्धानो नभस्वत्यां हविर्धानमविन्दत।
य इन्द्रमश्वहर्तारं विद्वानपि न जघ्निवान्॥ ५
अन्तर्धानके नभस्वती नामकी पत्नीसे एक और पुत्र-रत्न हविर्धान प्राप्त हुआ। महाराज अन्तर्धान बड़े उदार पुरुष थे। जिस समय इन्द्र उनके पिताके अश्वमेध-यज्ञका घोड़ा हरकर ले गये थे, उन्होंने पता लग जानेपर भी उनका वध नहीं किया था॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 524) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/5/