॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.24.47
प्रीतिप्रहसितापांगमलकैरुपशोभितम् ।
लसत्पङ्कजकिंजल्कदुकूलं मृष्टकुण्डलम्॥ ४७
prītiprahasitāpāṃgamalakairupaśobhitam |
lasatpaṅkajakiṃjalkadukūlaṃ mṛṣṭakuṇḍalam|| 47
अर्थ
प्रीतिपूर्ण उन्मुक्त हास्य, तिरछी चितवन, काली-काली घुँघराली अलकें, कमलकुसुमकी केसरके समान फहराता हुआ पीताम्बर, झिलमिलाते हुए कुण्डल, चमचमाते हुए मुकुट, कंकण, हार, नूपुर और मेखला आदि विचित्र आभूषण तथा शंख, चक्र, गदा, पद्म, वनमाला और कौस्तुभमणिके कारण उसकी अपूर्व शोभा है॥ ४७-४८॥✎ 413