श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.34

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

नमः पङ्कजनाभाय भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मने।

वासुदेवाय शान्ताय कूटस्थाय स्वरोचिषे॥ ३४

namaḥ paṅkajanābhāya bhūtasūkṣmendriyātmane|

vāsudevāya śāntāya kūṭasthāya svarociṣe|| 34

अर्थ

आप पद्मनाभ (समस्त लोकोंके आदिकारण) हैं; भूतसूक्ष्म (तन्मात्र) और इन्द्रियोंके नियन्ता, शान्त, एकरस और स्वयंप्रकाश वासुदेव (चित्तके अधिष्ठाता) भी आप ही हैं; आपको नमस्कार है॥ ३४॥

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