श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

मत्तभ्रमरसौस्वर्यहृष्टरोमलताङ्‌घ्रिपम् ।

पद्मकोशरजो दिक्षु विक्षिपत्पवनोत्सवम्॥ २२

mattabhramarasausvaryahṛṣṭaromalatāṅghripam |

padmakośarajo dikṣu vikṣipatpavanotsavam|| 22

अर्थ

उसके चारों ओर तरह-तरहके वृक्ष और लताएँ थीं, उनपर मतवाले भौंरे गूँज रहे थे। उनकी मधुर ध्वनिसे हर्षित होकर मानो उन्हें रोमांच हो रहा था। कमलकोशके परागपुंज वायुके झकोरोंसे चारों ओर उड़ रहे थे मानो वहाँ कोई उत्सव हो रहा है॥ २२॥

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