ब्रह्मर्षे! शिवजीके साथ समागम होना तो देहधारियोंके लिये बहुत कठिन है। औरोंकी तो बात ही क्या है—मुनिजन भी सब प्रकारकी आसक्ति छोड़कर उन्हें पानेके लिये उनका निरन्तर ध्यान ही किया करते हैं, किन्तु सहजमें पाते नहीं॥ १७॥
संगमः खलु विप्रर्षे शिवेनेह शरीरिणाम्।
दुर्लभो मुनयो दध्युरसंगाद्यमभीप्सितम्॥ १७
ब्रह्मर्षे! शिवजीके साथ समागम होना तो देहधारियोंके लिये बहुत कठिन है। औरोंकी तो बात ही क्या है—मुनिजन भी सब प्रकारकी आसक्ति छोड़कर उन्हें पानेके लिये उनका निरन्तर ध्यान ही किया करते हैं, किन्तु सहजमें पाते नहीं॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 525) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/17/