श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.10

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

यस्येदं देवयजनमनु यज्ञं वितन्वतः।

प्राचीनाग्रैः कुशैरासीदास्तृतं वसुधातलम्॥ १०

yasyedaṃ devayajanamanu yajñaṃ vitanvataḥ|

prācīnāgraiḥ kuśairāsīdāstṛtaṃ vasudhātalam|| 10

अर्थ

उन्होंने एक स्थानके बाद दूसरे स्थानमें लगातार इतने यज्ञ किये कि यह सारी भूमि पूर्वकी ओर अग्रभाग करके फैलाये हुए कुशोंसे पट गयी थी (इसीसे आगे चलकर वे ‘प्राचीनबर्हि’ नामसे विख्यात हुए)॥ १०॥

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