कुछ दिन तो उन्होंने कन्द-मूल-फल खाकर बिताये, कुछ काल सूखे पत्ते खाकर रहे, फिर कुछ पखवाड़ोंतक जलपर ही रहे और इसके बाद केवल वायुसे ही निर्वाह करने लगे॥ ५॥
कन्दमूलफलाहारः शुष्कपर्णाशनः क्वचित्।
अब्भक्षः कतिचित्पक्षान् वायुभक्षस्ततः परम्॥ ५
कुछ दिन तो उन्होंने कन्द-मूल-फल खाकर बिताये, कुछ काल सूखे पत्ते खाकर रहे, फिर कुछ पखवाड़ोंतक जलपर ही रहे और इसके बाद केवल वायुसे ही निर्वाह करने लगे॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.23.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 520) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/23/5/