श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

विधाय कृत्यं ह्रदिनीजलाप्लुता

दत्त्वोदकं भर्तुरुदारकर्मणः।

नत्वा दिविस्थांस्त्रिदशांस्त्रिः परीत्य

विवेश वह्निं ध्यायती भर्तृपादौ॥ २२

vidhāya kṛtyaṃ hradinījalāplutā

dattvodakaṃ bharturudārakarmaṇaḥ|

natvā divisthāṃstridaśāṃstriḥ parītya

viveśa vahniṃ dhyāyatī bhartṛpādau|| 22

अर्थ

इसके बाद उस समयके सारे कृत्य कर नदीके जलमें स्नान किया। अपने परम पराक्रमी पतिको जलांजलि दे आकाशस्थित देवताओंकी वन्दना की तथा तीन बार चिताकी परिक्रमा कर पतिदेवके चरणोंका ध्यान करती हुई अग्‍निमें प्रवेश कर गयी॥ २२॥

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