श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.58

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

वर्षति स्म यथाकामं पर्जन्य इव तर्पयन्।

समुद्र इव दुर्बोधः सत्त्वेनाचलराडिव॥ ५८

varṣati sma yathākāmaṃ parjanya iva tarpayan|

samudra iva durbodhaḥ sattvenācalarāḍiva|| 58

अर्थ

समय-समयपर प्रजाजनोंको तृप्त करनेके लिये वे मेघके समान उनके अभीष्ट अर्थोंको खुले हाथसे लुटाते रहते थे। वे समुद्रके समान गम्भीर और पर्वतराज सुमेरुके समान धैर्यवान् भी थे॥ ५८॥

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