श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.50

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

कर्माणि च यथाकालं यथादेशं यथाबलम्।

यथोचितं यथावित्तमकरोद्ब्रह्मसात्कृतम्॥ ५०

karmāṇi ca yathākālaṃ yathādeśaṃ yathābalam|

yathocitaṃ yathāvittamakarodbrahmasātkṛtam|| 50

अर्थ

वे ब्रह्मार्पण-बुद्धिसे समय, स्थान, शक्ति, न्याय और धनके अनुसार सभी कर्म करते थे॥ ५०॥

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