श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तत्पादशौचसलिलैर्मार्जितालकबन्धनः ।

तत्र शीलवतां वृत्तमाचरन्मानयन्‍निव॥ ५

tatpādaśaucasalilairmārjitālakabandhanaḥ |

tatra śīlavatāṃ vṛttamācaranmānayanniva|| 5

अर्थ

फिर उनके चरणोदकको अपने सिरके बालोंपर छिड़का। इस प्रकार शिष्टजनोचित आचारका आदर तथा पालन करके उन्होंने यही दिखाया कि सभी सत्पुरुषोंको ऐसा व्यवहार करना चाहिये॥ ५॥

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