श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.48

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

त आत्मयोगपतय आदिराजेन पूजिताः।

शीलं तदीयं शंसन्तः खेऽभूवन्मिषतां नृणाम्॥ ४८

ta ātmayogapataya ādirājena pūjitāḥ|

śīlaṃ tadīyaṃ śaṃsantaḥ khe'bhūvanmiṣatāṃ nṛṇām|| 48

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! फिर आदिराज पृथुने आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ सनकादिकी पूजा की और वे उनके शीलकी प्रशंसा करते हुए सब लोगोंके सामने ही आकाशमार्गसे चले गये॥ ४८॥

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