श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.38

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

यस्मिन्‍निदं सदसदात्मतया विभाति

माया विवेकविधुति स्रजि वाहिबुद्धिः।

तं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्धतत्त्वं

प्रत्यूढकर्मकलिलप्रकृतिं प्रपद्ये॥ ३८

yasminnidaṃ sadasadātmatayā vibhāti

māyā vivekavidhuti sraji vāhibuddhiḥ|

taṃ nityamuktapariśuddhavibuddhatattvaṃ

pratyūḍhakarmakalilaprakṛtiṃ prapadye|| 38

अर्थ

जिस प्रकार मालाका ज्ञान हो जानेपर उसमें सर्पबुद्धि नहीं रहती, उसी प्रकार विवेक होनेपर जिसका कहीं पता नहीं लगता, ऐसा यह मायामय प्रपंच जिसमें कार्य-कारणरूपसे प्रतीत हो रहा है और जो स्वयं कर्मफल कलुषित प्रकृतिसे परे है, उस नित्यमुक्त, निर्मल और ज्ञानस्वरूप परमात्माको मैं प्राप्त हो रहा हूँ॥ ३८॥

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