श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

पृथोस्तत्सूक्तमाकर्ण्य सारं सुष्ठु मितं मधु।

स्मयमान इव प्रीत्या कुमारः प्रत्युवाच ह॥ १७

pṛthostatsūktamākarṇya sāraṃ suṣṭhu mitaṃ madhu|

smayamāna iva prītyā kumāraḥ pratyuvāca ha|| 17

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—राजा पृथुके ये युक्तियुक्त, गम्भीर, परिमित और मधुर वचन सुनकर श्रीसनत्कुमारजी बड़े प्रसन्‍न हुए और कुछ मुसकराते हुए कहने लगे॥ १७॥

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