श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तदहं कृतविश्रम्भः सुहृदो वस्तपस्विनाम्।

संपृच्छे भव एतस्मिन् क्षेमः केनाञ्जसा भवेत्॥ १५

tadahaṃ kṛtaviśrambhaḥ suhṛdo vastapasvinām|

saṃpṛcche bhava etasmin kṣemaḥ kenāñjasā bhavet|| 15

अर्थ

आप संसारानलसे सन्तप्त जीवोंके परम सुहृद‍् हैं, इसलिये आपमें विश्वास करके मैं यह पूछना चाहता हूँ कि इस संसारमें मनुष्यका किस प्रकार सुगमतासे कल्याण हो सकता है?॥ १५॥

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