श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.50

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

नात्यद्भुतमिदं नाथ तवाजीव्यानुशासनम्।

प्रजानुरागो महतां प्रकृतिः करुणात्मनाम्॥ ५०

nātyadbhutamidaṃ nātha tavājīvyānuśāsanam|

prajānurāgo mahatāṃ prakṛtiḥ karuṇātmanām|| 50

अर्थ

स्वामिन्! अपने आश्रितोंको इस प्रकारका श्रेष्ठ उपदेश देना आपके लिये कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि अपनी प्रजाके ऊपर प्रेम रखना तो करुणामय महापुरुषोंका स्वभाव ही होता है॥ ५०॥

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