श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.44

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

गुणायनं शीलधनं कृतज्ञं

वृद्धाश्रयं संवृणतेऽनु सम्पदः।

प्रसीदतां ब्रह्मकुलं गवां च

जनार्दनः सानुचरश्‍च मह्यम्॥ ४४

guṇāyanaṃ śīladhanaṃ kṛtajñaṃ

vṛddhāśrayaṃ saṃvṛṇate'nu sampadaḥ|

prasīdatāṃ brahmakulaṃ gavāṃ ca

janārdanaḥ sānucaraśca mahyam|| 44

अर्थ

उस गुणवान्, शीलसम्पन्‍न, कृतज्ञ और गुरुजनोंकी सेवा करनेवाले पुरुषके पास सारी सम्पदाएँ अपने-आप आ जाती हैं। अतः मेरी तो यही अभिलाषा है कि ब्राह्मणकुल, गोवंश और भक्तोंके सहित श्रीभगवान् मुझपर सदा प्रसन्‍न रहें॥ ४४॥

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