श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.33

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

तमेव यूयं भजतात्मवृत्तिभि-

र्मनोवचःकायगुणैः स्वकर्मभिः।

अमायिनः कामदुघाङ्‌घ्रिपङ्कजं

यथाधिकारावसितार्थसिद्धयः ॥ ३३

tameva yūyaṃ bhajatātmavṛttibhi-

rmanovacaḥkāyaguṇaiḥ svakarmabhiḥ|

amāyinaḥ kāmadughāṅghripaṅkajaṃ

yathādhikārāvasitārthasiddhayaḥ || 33

अर्थ

जिनके चरणकमलोंकी सेवाके लिये निरन्तर बढ़नेवाली अभिलाषा उन्हींके चरणनखसे निकली हुई गंगाजीके समान, संसारतापसे संतप्त जीवोंके समस्त जन्मोंके संचित मनोमलको तत्काल नष्ट कर देती है, जिनके चरणतलका आश्रय लेनेवाला पुरुष सब प्रकारके मानसिक दोषोंको धो डालता तथा वैराग्य और तत्त्वसाक्षात्काररूप बल पाकर फिर इस दुःखमय संसारचक्रमें नहीं पड़ता और जिनके चरणकमल सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं—उन प्रभुको आपलोग अपनी-अपनी आजीविकाके उपयोगी वर्णाश्रमोचित अध्यापनादि कर्मों तथा ध्यान-स्तुति-पूजादि मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक क्रियाओंके द्वारा भजें। हृदयमें किसी प्रकारका कपट न रखें तथा यह निश्‍चय रखें कि हमें अपने-अपने अधिकारानुसार इसका फल अवश्य प्राप्त होगा॥ ३१—३३॥

यह अर्थ श्लोक 31–33 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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