श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

वरं च मत् कंचन मानवेन्द्र

वृणीष्व तेऽहं गुणशीलयन्त्रितः।

नाहं मखैर्वै सुलभस्तपोभि-

र्योगेन वा यत्समचित्तवर्ती॥ १६

varaṃ ca mat kaṃcana mānavendra

vṛṇīṣva te'haṃ guṇaśīlayantritaḥ|

nāhaṃ makhairvai sulabhastapobhi-

ryogena vā yatsamacittavartī|| 16

अर्थ

राजन्! तुम्हारे गुणोंने और स्वभावने मुझको वशमें कर लिया है। अतः तुम्हें जो इच्छा हो, मुझसे वर माँग लो। उन क्षमा आदि गुणोंसे रहित यज्ञ, तप अथवा योगके द्वारा मुझको पाना सरल नहीं है, मैं तो उन्हींके हृदयमें रहता हूँ जिनके चित्तमें समता रहती है॥ १६॥

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