श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

एतदाख्याहि मे ब्रह्मन् जामातुः श्‍वशुरस्य च।

विद्वेषस्तु यतः प्राणांस्तत्यजे दुस्त्यजान्सती॥ ३

etadākhyāhi me brahman jāmātuḥ śvaśurasya ca|

vidveṣastu yataḥ prāṇāṃstatyaje dustyajānsatī|| 3

अर्थ

भगवन्! उन ससुर और दामादमें इतना विद्वेष कैसे हो गया, जिसके कारण सतीने अपने दुस्त्यज प्राणोंतककी बलि दे दी? यह आप मुझसे कहिये॥ ३॥

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