श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

तस्यैवं ददतः शापं श्रुत्वा द्विजकुलाय वै।

भृगुः प्रत्यसृजच्छापं ब्रह्मदण्डं दुरत्ययम्॥ २७

tasyaivaṃ dadataḥ śāpaṃ śrutvā dvijakulāya vai|

bhṛguḥ pratyasṛjacchāpaṃ brahmadaṇḍaṃ duratyayam|| 27

अर्थ

नन्दीश्‍वरके मुखसे इस प्रकार ब्राह्मणकुलके लिये शाप सुनकर उसके बदलेमें भृगुजीने यह दुस्तर शापरूप ब्रह्मदण्ड दिया॥ २७॥

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