श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.24

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसौ जडः।

संसरन्त्विह ये चामुमनु शर्वावमानिनम्॥ २४

vidyābuddhiravidyāyāṃ karmamayyāmasau jaḍaḥ|

saṃsarantviha ye cāmumanu śarvāvamāninam|| 24

अर्थ

यह मूर्ख कर्ममयी अविद्याको ही विद्या समझता है; इसलिये यह और जो लोग भगवान् शङ्करका अपमान करनेवाले इस दुष्टके पीछे-पीछे चलनेवाले हैं, वे सभी जन्म-मरणरूप संसारचक्रमें पड़े रहें॥ २४॥

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