श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

वयं मरुत्वन्तमिहार्थनाशनं

ह्वयामहे त्वच्छ्रवसा हतत्विषम्।

अयातयामोपहवैरनन्तरं

प्रसह्य राजन् जुहवाम तेऽहितम्॥ २८

vayaṃ marutvantamihārthanāśanaṃ

hvayāmahe tvacchravasā hatatviṣam|

ayātayāmopahavairanantaraṃ

prasahya rājan juhavāma te'hitam|| 28

अर्थ

इस यज्ञकार्यमें विघ्न डालनेवाला आपका शत्रु इन्द्र तो आपके सुयशसे ही ईर्ष्यावश निस्तेज हो रहा है। हम अमोघ आवाहन-मन्त्रोंद्वारा उसे यहीं बुला लेते हैं और बलात् अग्‍निमें हवन किये देते हैं’॥ २८॥

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