जब वह इन्द्रपर वार किये बिना ही लौट आया, तब महर्षि अत्रिने पुनः उसे इन्द्रको मारनेके लिये आज्ञा दी—‘वत्स! इस देवताधम इन्द्रने तुम्हारे यज्ञमें विघ्न डाला है, तुम इसे मार डालो’॥ १५॥
वधान्निवृत्तं तं भूयो हन्तवेऽत्रिरचोदयत्।
जहि यज्ञहनं तात महेन्द्रं विबुधाधमम्॥ १५
जब वह इन्द्रपर वार किये बिना ही लौट आया, तब महर्षि अत्रिने पुनः उसे इन्द्रको मारनेके लिये आज्ञा दी—‘वत्स! इस देवताधम इन्द्रने तुम्हारे यज्ञमें विघ्न डाला है, तुम इसे मार डालो’॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 497) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/15/