श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.31

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ग्रामान् पुरः पत्तनानि दुर्गाणि विविधानि च।

घोषान् व्रजान् सशिबिरानाकरान् खेटखर्वटान्॥ ३१✎ 1939

grāmān puraḥ pattanāni durgāṇi vividhāni ca|

ghoṣān vrajān saśibirānākarān kheṭakharvaṭān|| 31

अर्थ

अनेकों गाँव, कस्बे, नगर, दुर्ग, अहीरोंकी बस्ती, पशुओंके रहनेके स्थान, छावनियाँ, खानें, किसानोंके गाँव और पहाड़ोंकी तलहटीके गाँव बसाये॥ ३१॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1939 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सशिविरान → सशिबिरान

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