श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

वटवत्सा वनस्पतयः पृथग्रसमयं पयः।

गिरयो हिमवद्वत्सा नानाधातून् स्वसानुषु॥ २५

vaṭavatsā vanaspatayaḥ pṛthagrasamayaṃ payaḥ|

girayo himavadvatsā nānādhātūn svasānuṣu|| 25

अर्थ

वृक्षोंने वटको वत्स बनाकर अनेक प्रकारका रसरूप दूध दुहा और पर्वतोंने हिमालयरूप बछड़ेके द्वारा अपने शिखररूप पात्रोंमें अनेक प्रकारकी धातुओंको दुहा॥ २५॥

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