श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.23

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

पशवो यवसं क्षीरं वत्सं कृत्वा च गोवृषम्।

अरण्यपात्रे चाधुक्षन्मृगेन्द्रेण च दंष्ट्रिणः॥ २३

paśavo yavasaṃ kṣīraṃ vatsaṃ kṛtvā ca govṛṣam|

araṇyapātre cādhukṣanmṛgendreṇa ca daṃṣṭriṇaḥ|| 23

अर्थ

पशुओंने भगवान् रुद्रके वाहन बैलको वत्स बनाकर वनरूप पात्रमें तृणरूप दूध दुहा। बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले मांसभक्षी जीवोंने सिंहरूप बछड़ेके द्वारा अपने शरीररूप पात्रमें कच्चा मांसरूप दूध दुहा तथा गरुडजीको वत्स बनाकर पक्षियोंने कीट-पतंगादि चर और फलादि अचर पदार्थोंको दुग्धरूपसे दुहा॥ २३-२४॥

यह अर्थ श्लोक 23–24 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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