श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.1

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अथाष्टादशोऽध्यायः

पृथ्वी-दोहन

मैत्रेय उवाच

इत्थं पृथुमभिष्टूय रुषा प्रस्फुरिताधरम्।

पुनराहावनिर्भीता संस्तभ्यात्मानमात्मना॥ १

itthaṃ pṛthumabhiṣṭūya ruṣā prasphuritādharam|

punarāhāvanirbhītā saṃstabhyātmānamātmanā|| 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस समय महाराज पृथुके होठ क्रोधसे काँप रहे थे। उनकी इस प्रकार स्तुति कर पृथ्वीने अपने हृदयको विचारपूर्वक समाहित किया और डरते-डरते उनसे कहा॥ १॥

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