श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

एवं मन्युमयीं मूर्तिं कृतान्तमिव बिभ्रतम्।

प्रणता प्राञ्जलिः प्राह मही संजातवेपथुः॥ २८

evaṃ manyumayīṃ mūrtiṃ kṛtāntamiva bibhratam|

praṇatā prāñjaliḥ prāha mahī saṃjātavepathuḥ|| 28

अर्थ

इस समय महाराज पृथु कालकी भाँति क्रोधमयी मूर्ति धारण किये हुए थे। उनके ये शब्द सुनकर धरती काँपने लगी और उसने अत्यन्त विनीतभावसे हाथ जोड़कर कहा॥ २८॥

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